कला मानव के कृतित्व की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति है।
गांव हो या शहर संगीत और नृत्य के बिना कोई भी उत्सव संपन्न नहीं होता है। इन कलाओं के द्वारा ही वहां के जन हर्षोल्लास को अभिव्यक्त करते हैं।
कला एक माध्यम है या ध्येय है? कला का कोई प्रयोजन है या कला स्वयं ही प्रयोजन है? कला को कहां और कैसे प्रयुक्त किया जाए यह सोचना आवश्यक है या कला को कैसे संवारा जाए यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है?
कला को मूल में सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। यह पाया जाता है कि हर बालक जन्म से ही सुन्दर और कुरूप में भेद समझता है। वह स्वतः ही सुन्दर की ओर आकर्षित होता है और वीभत्स से भर खाता है। अच्छे संगीत से मुग्ध होता है और कोलाहल से व्याकुल होता है।
हम कह सकते हैं कि कला प्रकृति का उज्जवल रूप है। कला कोलाहल के परे का संगीत है। कला प्रकृति की सकारात्मकता की अभिव्यक्ति है।
मानव में कला श्रेष्ठ भावनाओं की अभिव्यक्ति है। कोई भी कार्य जब तल्लीन हो कर किया जाता है तो वह कला हो जाता है।
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